अगर भारत के हिंदुओं से कहा जाए- देश में रहना होगा तो अल्ला-हू-अकबर कहना होगा…

यदि मैं इस देश में रहने वाले हिंदुओं से कहूं कि अगर भारत में रहना होगा तो अल्लाह हू अकबर कहना होगा कैसा लगेगा? है न हरमजदगी वाली बात। क’ट्टरता और ख़ौ’फ पैदा करने वाली बात। फिर मैं कहूं कि भारत देश अल्लाह का देश है। तुमको देश के लिए अल्लाह हू अकबर बोलना ही होगा। फिर क्या होगा? देश की आड़ में हिंदुओं से ‘अल्लाह हू अकबर’ कहलवाया जाएगा। लेकिन क्या यह सही होगा? बिल्कुल नहीं। हम अपने अल्लाह को किसी पर जबर्ज़स्ती कैसे थोप सकते हैं। हिंदुओं के अपने आराध्य हैं। देवी-देवता और भगवान हैं। फिर उनसे अल्लाह की जय जयकार क्यों ? यह तो बिल्कुल भी न्यायोचित नहीं है।

इस्लाम एकेश्वरवाद की अवधारणा पर आधारित घर्म है। ईश्वर के अलावा किसी अन्य की पूजा करना इस्लाम में पाप है। भारत माता की अवधारणा इस्लामिक तौर पर ठीक नहीं। इस्लाम सूरज़ चाँद जमीन आसमान को किसी भी प्रकार की उपमा देने का विरोधी है। बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम् गीत में भारत देश को देवी दुर्गा का स्वरूप मानते हुए देशवासियों को उस माँ की संतान बताया है।

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चटर्जी ने भारत को वो माँ बताया जो अंधकार और पीड़ा से घिरी हुई है। उसके बच्चों से बंकिम आग्रह करते हैं कि वे अपनी माँ की वंदना करें और उसे शोषण से बचाएँ। पहली आपत्ति यहीं पर दर्ज हो रही है। यदि आप आनंद मठ जहां से यह गीत लिया गया है को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि बंकिम ने उस समय के मुस्लिम शासकों के प्रति काफी हद तक घृणा परोसी है।

आनंद मठ हिंदू साधुओं द्वारा मुस्लिम राजाओं के खिलाफ किए गए आंदोलन की कहानी पर आधारित है। बंकिम ने इसमें मुसलमानों के प्रति काफी तीखी भाषा का इस्तेमाल किया है। आज़ादी से पहले ही इस गीत पर कांग्रेस में दो फाड़ हो गई थी। मुस्लिम लीग ने विरोध के बावजूद इस गीत के शुरूआत के दौ पैरा पर सहमति जताई थी लेकिन हिंदू महासभा पूरे गीत पर अड़ी रही।

आखिर में नेहरू तथा गाँधी की सर्व सहमति से इस गीत को नकार दिया। लेकिन राजेंद्र प्रसाद द्वारा बहुसंख्यक राष्ट्रवाद को उभारने हेतु इसे फिर से सामने लाया गया। पाकिस्तान में मुस्लिम से मुकाबला करने के लिए भारत में हिंदू को सरकार ने खूब मदद की। सरहद के दोनों ओर धर्म के नाम पर सत्ता का बखूबी इस्तेमाल किया गया।

और आज जिसका नतीज़ा है कि दोनों ही मुल्क अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में विफल रहे और आज भी इन्हीं सब बातों में उलझे हुए हैं।

पत्रकार मुहम्मद अनस की कलम से निजी विचार