तीन तलाक पर ज़ोर देने वाली मोदी सरकार को मॉब लिं’चिंग से पीड़ित मुस्लि’म महिलाओं की फिक्र क्यों नहीं है?

मुस्लि’म बहनों के साथ लैंगिक न्याय करने के नाम पर मोदी सरकार द्वारा संसद में हाल में पेश एक विधेयक को लेकर देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस विधेयक में तीन तलाक को अपराध घोषित किया गया है। नरेंद्र मोदी की पिछली सरकार ने भी संसद में ऐसा ही एक विधेयक पेश किया था। उस विधेयक को लोकसभा ने पारित भी कर दिया था, लेकिन राज्यसभा में बीजेपी का बहुमत नहीं था इसलिए वह विधेयक कानून नहीं बन सका।

सरकार लोगों से जबरन मुझसे प्रेम नहीं करवा सकती लेकिन वो मुझे पीटकर मार डालने से रोक सकती है, ये मार्टिन लूथर किंग जूनियर के शब्द हैं जो बुधवार को भारत के तमाम शहरों कई इलाक़ों में गूंजे।

मोदी सरकार द्वारा पिछला विधेयक सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद लाया गया था, जिसमें तीन तलाक को अवैध घोषित किया गया था। अब सरकार का तर्क यह है कि इस विधेयक को जल्द से जल्द पारित किया जाये क्योंकि पिछले विधेयक को पेश किये जाने के बाद से देश भर में तीन तलाक के करीब 200 मामले सामने आये हैं।

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सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि तीन तलाक और तुरत-फुरत तीन तलाक में फर्क है। कुरान, पत्नी को तलाक देने के लिए तीन तलाक विधि को मान्यता देता है। कुरान के अनुसार, पहली बार तलाक कहने के बाद कुछ समय दिया जाना चाहिए, जिसके दौरान दोनों पक्षों के मध्यस्थ पति-पत्नी में समझौता करवाने का प्रयास करें। अगर ये प्रयास असफल हो जाते हैं, तो दूसरी बार तलाक शब्द का उच्चारण किया जाता है। इसके बाद फिर कुछ वक़्त तक समझौते के प्रयास किये जाते हैं।

अगर समझौता नहीं हो पाता सिर्फ तब ही तीसरी और अंतिम बार तलाक शब्द का उच्चारण किया जाता है, जिसके बाद पति-पत्नी अलग हो जाते हैं। वही कुरान के मुताबिक यदि पति-पत्नी के बीच बिगाड़ का भय हो, तो एक पंच पुरुष के लोगों में से और एक पंच स्त्री के लोगों में से नियुक्त करो। यदि वे दोनों सुधार करना चाहेंगे, तो अल्लाह उनके बीच अनुकूलता पैदा कर देगा 4:35 और फिर जब वे अपनी नीयत इद्दत को पहुँचें तो या तो उन्हें भली रीति से रोक लो या भली रीति से अलग कर दो। और अपने में से दो न्याय प्रिय आदमियों को गवाह बना लो और अल्लाह के लिए गवाही को दुरुस्त रखो 65:2.

जिस बात की चर्चा कम ही होती है, वह यह है कि कुरान औरतों को भी अपनी मर्ज़ी से ‘खुला’ शब्द का उच्चारण कर, वैवाहिक सम्बन्ध समाप्त करने की इज़ाज़त देती है। भ्रष्ट मौलवी जिनके लिए इस्लाम में कोई जगह ही नहीं है, इस मामले में मुस्लिम समुदाय को गुमराह करते रहे हैं। मौलवियों ने ही एक बार में तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण कर तुरत-फुरत तलाक देने की पद्धति को मान्यता दी है, इसका कुरान से कोई लेना-देना नहीं है।

तुरत-फुरत तीन तलाक की प्रक्रिया समुदाय में व्यापक तौर पर मान्य हो गयी है और इसके कारण मुस्लि’म औरतों को बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं। कुरान में वर्णित तीन तलाक की प्रथा जो कि मुस्लिम पर्सनल लॉ का भाग है के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि, चूँकि यह प्रथा तीन तलाक मुस्लि’म पर्सनल लॉ का हिस्सा है इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद 25 का संरक्षण प्राप्त है। धर्म का सम्बन्ध आस्था से है, तार्किकता से नहीं। कोई भी अदालत ऐसी किसी प्रथा जो किसी धर्म का अविभाज्य हिस्सा है पर समानता के सिद्धांत को वरीयता नहीं दे सकती।

टिप्पणीकार यह स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को नहीं बल्कि तुरत-फुरत तीन तलाक को अवैध ठहराया है जो कि पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित मुस्लि’म देशों में प्रतिबंधित है। जब अदालत ने पहले ही इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया है तब फिर इस विधेयक की क्या ज़रुरत है? अगर अब भी तुरत-फुरत तलाक हो रहे हैं तो वे कानून का उल्लंघन हैं और उनसे वर्तमान कानूनों के तहत निपटा जा सकता है। फिर, यह विधेयक सरकार की इतनी उच्च प्राथमिकता पर क्यों है? बल्कि इस विधेयक की ज़रुरत ही क्या है?

दरअसल मोदी सरकार की मुस्लि’म महिलाओं के बारे में चिंता, घड़ियाली आसुंओं के सिवा कुछ नहीं है। मुस्लि’म बहनों की मुख्य समस्याएं क्या हैं? उनकी मुख्य समस्या यह है कि बी$फ खाने उसका व्यापार करने या बी$फ रखने के शक में उनके भाइयों को और पतियों को पीट-पीटकर ह@त्या की जा रही है।

उनकी मुख्य समस्या यह है कि ट्रेन में एक मुस्लि’म को सिर्फ इसलिए मार डाला गया क्योंकि भीड़ को शक था कि उसके टिफ़िन में बी$फ है। उनकी मुख्य समस्या यह है कि उनके भाइयों को खम्बे से बांधकर पीटते हुए जय श्रीराम कहने पर मजबूर किया जाता है और राम का जयकारा लगाने के बाद भी उनकी जान ले ली जाती है। उनकी मुख्य समस्या यह है कि शीर्ष बीजेपी नेता, गौ’र’क्षा या बी$फ के नाम पर ह@त्या करने वालों का सम्मान करने के लिए आतुर रहते हैं।

राम पुनियानी का लेख